– छोटे दलों, निर्दलीय सांसदों और छोटे प्रदेशों की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी बड़े दल की: संसद सबकी है, इसलिए हर जनप्रतिनिधि को बोलने का समान अधिकार मिलना चाहिए: सांसद उमेश पटेल
असली आजादी न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली, 29 जुलाई। दमण-दीव सांसद उमेश पटेल ने आज संसद परिसर में शिक्षा एवं परीक्षा सुधार संबंधी महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा के दौरान छोटे दलों एवं निर्दलीय सांसदों को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिए जाने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। सांसद उमेश पटेल ने कहा कि उन्हें शिक्षा एवं परीक्षा सुधार जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक पर अपने विचार रखने के लिए पहले देर रात तक प्रतीक्षा करने को कहा गया और आज भी सुबह से शाम तक यह आश्वासन दिया गया कि उन्हें पर्याप्त समय दिया जाएगा। इसके बावजूद उन्हें सदन में अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि वे इस विधेयक के माध्यम से देश के करोड़ों विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं युवाओं की आवाज संसद में उठाना चाहते थे। उनका उद्देश्य केवल कानून का समर्थन या विरोध करना नहीं था, बल्कि परीक्षा प्रणाली में बार-बार सामने आने वाली संस्थागत कमियों, पेपर लीक, जवाबदेही, पारदर्शिता तथा युवाओं के विश्वास को पुन: स्थापित करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने सुझाव रखना था। सांसद उमेश पटेल ने यह भी कहा कि आज प्रात: शून्यकाल में उनका नाम सूचीबद्ध था, जहाँ वे अपने संसदीय क्षेत्र दादरा नगर हवेली और दमण-दीव में हाल ही में आई बाढ़, मधुबन बांध से छोड़े गए पानी तथा प्रभावित नागरिकों और मछुआरों की समस्याओं का मुद्दा उठाना चाहते थे। किन्तु सदन में लगातार हुए हंगामे के कारण वह अवसर भी नहीं मिल सका।
उन्होंने कहा कि बार-बार सदन की कार्यवाही बाधित होने का सबसे अधिक नुकसान उन सांसदों को होता है जो छोटे दलों, निर्दलीय सांसदों अथवा छोटे राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बड़े दलों के पास कई अवसर होते हैं, जबकि सीमित समय में छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों की आवाज दब जाती है। सांसद उमेश पटेल ने प्रश्न उठाया कि क्या संसद केवल बड़े राजनीतिक दलों और बड़े नेताओं की आवाज सुनने का मंच बनकर रह जाएगी, या फिर लोकतंत्र की भावना के अनुरूप प्रत्येक निर्वाचित सांसद को समान रूप से अपने क्षेत्र और देश की जनता की बात रखने का अवसर मिलेगा। इसी मुद्दे को लेकर सांसद उमेश बाबू पटेल ने संसद के मकर द्वार पर अपने सम्मानित सांसद साथियों राजकुमार रोत, विशाल पाटिल, हनुमान बेनीवाल एवं चंद्रशेखर आजाद के साथ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया तथा लोकतंत्र में छोटे दलों, निर्दलीय सांसदों एवं छोटे राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की आवाज को समान महत्व देने की मांग की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और यहाँ प्रत्येक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को बिना किसी भेदभाव के अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए। संसद में संवाद, चर्चा और समाधान की परंपरा को मजबूत करना ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
अंत में सांसद उमेश पटेल ने कहा कि उनका विरोध किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, संसद की गरिमा बनाए रखने तथा देश के प्रत्येक नागरिक की आवाज को समान सम्मान दिलाने के उद्देश्य से है। लोकतंत्र की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। छोटे दलों, निर्दलीय सांसदों और छोटे प्रदेशों की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी बड़े दल की। संसद सबकी है, इसलिए हर जनप्रतिनिधि को बोलने का समान अधिकार मिलना चाहिए।

