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राष्ट्रपति मुर्मू के निमंत्रण में दिखी देश की समृद्ध कला और संस्कृति की झलक

– 130 कारीगरों की टीम ने तीन माह में तैयार की निमंत्रण किट : छत्तीसगढ़, गोवा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की समृद्ध कला परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बड़े ही खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है

नई दिल्ली, (ईएमएस)। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले ‘एट होम’ कार्यक्रम की आमंत्रण किट में भारतीय कला और संस्कृति का एक अनूठा संगम दिखाई दे रहा है। 130 कारीगरों की अपनी टीम ने तीन माह में अलग-अलग राज्यों से कला किट को तैयार किया है, जिसमें छत्तीसगढ़, गोवा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की समृद्ध कला परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बड़े ही खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है।
राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों और अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) की टीम ने मिलकर निमंत्रण किट की संकल्पना तैयार की थी। एनआईडी के निदेशक अंशु मंडल ने बताया कि इस दल में छत्तीसगढ़ के करीब 50 कारीगर भी शामिल थे, जो कभी वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे क्षेत्र से आते हैं। इन कारीगरों ने छत्तीसगढ़ के शिक्षकों, डिजाइनरों और छात्रों के साथ मिलकर परियोजना पर काम किया।
निमंत्रण किट में शामिल चार राज्यों की कलाकृतियां वहां की कला और विरासत को दर्शाती हैं। छत्तीसगढ़ की खोकरा कास्टिंग, जो बस्तर की पुरानी धातु शिल्प परंपराओं में से एक है, समुदाय की पवित्र उपयोग की वस्तुओं को दिखाती है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ का एक बेल बजाने वाला पिटवा पेड़ भी किट का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल डिस्प्ले फ्रेम और घंटियां बनाने में किया गया है। यह पर्यावरण-अनुकूल कला स्थानीय आदिवासी समुदायों के रोजमर्रा के जीवन और संस्कृति की झलक दिखाती है। पेड़ वाली पट्टी पर लगी लोहे की घंटी भी बस्तर के कुकल आदिवासी कारीगर द्वारा पुराने कबाड़ से बनाई गई है।
गोवा की अंजुना वुड पैनल आर्ट में खराब भूमि का चित्रण है, जो मैंग्रोव जंगलों और दलदली इलाकों से पुन: प्राप्त की गई भूमि है, और जो धान की खेती, मछली पकड़ने तथा नमक बनाने में समुदायों की सहायता करती है। महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग छत्रपति संभाजीनगर में एक नदी के पुनरुद्धार की कहानी बताती है, जो जल प्रबंधन और पानी की साफ-सफाई के प्रयासों के बाद एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र में बदल गई है। वहीं, मध्य प्रदेश का भील चित्र समुदायों की रोजमर्रा की जिंदगी को दिखाता है, तथा स्थानीय वातावरण के अनुकूल अनाज, दालों और सब्जियों की स्वदेशी किस्मों को दर्शाता है। भील चित्रकला में पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन को बिंदुओं के जटिल पैटर्न के माध्यम से दर्शाया जाता है।
मेहमानों का स्वागत विशेष रूप से तैयार मेजपोश से होगा, जिसमें छत्तीसगढ़, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की कला परंपराओं को उनके क्षेत्रीय पैटर्न के माध्यम से एक साथ बुना गया है। मध्य प्रदेश के चंदेरी में दोहरी बुनाई से बनाए गए कपड़े में महेश्वर की करवट कही जाने वाली किनारी पट्टी, गोवा की गोंस गाड़ी की स्ट्राइप पट्टी, महाराष्ट्र की पैठणी बुनाई का पैटर्न और छत्तीसगढ़ की कोसा रेशम की पट्टी को शामिल किया गया है। आमंत्रण किट देश की भारतीय विविधता और विरासत की विविधता का एक शानदार प्रदर्शन है।

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