– आदिवासी समाज के कला संस्कृति और रीति एवं परंपराओं के साथ-साथ आदिवासी समाज के भू-संपदा और अधिकारों के संरक्षण को लेकर छिड़ी बहस – विभिन्न राजनीतिक संगठनों एवं सामाजिक संगठनों द्वारा खानवेल के चौडा ग्राउंड पर संयुक्त रूप से आयोजित किया गया दक्षिण गुजरात का सबसे बड़ा आदिवासी सम्मेलन एवं महोत्सव कार्यक्रम
असली आजादी न्यूज नटवर्क, सिलवासा, 9 अगस्त। दादरा नगर हवेली में सदियों से विभिन्न आदिवासी समाज के लोग रहते आ रहे हैं। सहयाद्री पर्वत मालाओं के आंचल में बसे दादरा नगर हवेली में 7 से अधिक आदिवासी समाज की जनजातियां पाई जाती है। जिसमें मुख्यत: वर्ली, कोकड़ा, धोडिया, हलपति, काथोड़ी जैसी प्रमुख जनजातियां है। इन सभी जनजातियों के अपने-अपने रीति रिवाज पूजा की पद्धतियां और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। बदलते समय के साथ आदिवासी समाज की पूजा पद्धतियां और सांस्कृतिक परंपराएं बदलने के साथ-साथ आदिवासी समाज के भू-संपदा और उनके अधिकारों को लेकर चर्चा तो होती है लेकिन सार्थक क्रियान्वयन नहीं होता है। आदिवासी समाज द्वारा आयोजित किए गए इस विश्व आदिवासी महोत्सव के दौरान कई वक्ताओं ने इन्हीं विषयों पर आदिवासी समाज को खुलकर काम करने का आह्वान किया और सरकार की उन नीतियों का खुलकर विरोध करने का अनुरोध किया गया जिससे आदिवासी समाज के अधिकारों एवं भू-संपदा का हनन किया जा रहा है। दक्षिण गुजरात के साथ-साथ महाराष्ट्र से भी आए आदिवासी समाज के वक्ताओं ने भी समय के साथ आदिवासी समाज के ऊपर बढ़ते सरकारी नीतियों के प्रभाव का अवलोकन करने का अनुरोध किया। साथ ही सरकार की परियोजनाओं को आदिवासी समाज के हितों एवं संस्कृतियों को जोड़कर बनाए जाने का अनुरोध भी किया गया। वहीं दूसरी ओर आदिवासी एकता परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रभु टोकिया ने आदिवासी समाज के विभिन्न अधिकारों की मांग करते हुए कहा कि खानवेल जैसे संपूर्ण आदिवासी विस्तार को एक जिले के रूप में घोषित किया जाना चाहिए और यहां पर आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए पूर्णकालिक जिला कलेक्टर की नियुक्ति किया जाना चाहिए। जिससे कि आदिवासी समाज अपनी समस्याओं को आसानी से अधिकारियों के सामने रख सकें। आदिवासी समाज द्वारा आयोजित किए गए इस आदिवासी महोत्सव में विभिन्न तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया और इन सभी कार्यक्रमों के माध्यम से यह अनुरोध किया गया कि आदिवासी समाज अपनी पूजा-पद्धतियों, सामाजिक रीति-रिवाजों, संस्कृति और परंपराओं के न सिर्फ संवर्धन के लिए काम करें बल्कि आने वाले समय में इसको कैसे संरक्षित किया जाय इस दिशा में काम किया जाना चाहिए।

