– रामायण और महाभारत के मूल में यात्राएं हैं: डॉ. बी.जे. कोप्पर
असली आजादी न्यूज नेटवर्क, दमण 24 जून। आधुनिक भारत के निर्माण में सतत यात्रारत यात्रियों का सर्बाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। घुमक्कड़ी ने भारत और भारतीयता को आकार दिया है। यह बात प्रसिद्ध कोशकार, लेखक और विचारक डॉ. कन्हैयालाल भट्ट ने भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग के केंद्रीय हिंदी निदेशालय और राजकीय महाविद्यालय दमण के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्त्वावधान में यात्रावृत्तांत और भारतीयता विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन (22/06/2026) के पहले सत्र (उद्घाटन सत्र) के अध्यक्ष के तौर पर कही। संगोष्ठी-प्रभारी और केंद्रीय हिंदी निदेशालय की सहायक निदेशक डॉ. प्रतिष्ठा श्रीवास्तव ने भाषा प्रेमियों को देशभर में हिंदी के प्रचार-प्रसार से संबंधित निदेशालय की विभिन्न योजनाओँ से परिचित कराते हुए कहा कि हमारा उद्देश्य नयी पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ते हुए चलना है। संगोष्ठी-समन्वयक डॉ. पुखराज जांगिड़ ने अपने बीज-वक्तव्य में संगोष्ठी की रूपरेखा और उद्देश्य स्पष्ट किया। प्रास्ताविक उद्बोधन में विकास उपाध्याय ने श्रोताओं को आधुनिक दमण के शिल्पकारों के रूप में कवि खबरदार, कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा और समाजसेवी प्रभाबेन शाह की यात्रा जीविता से जोड़ा। स्वागत प्राचार्य संजय कुमार ने धन्यवाद और उपाचार्य डॉ. सुब्रमणियन श्रीधरन ने किया। संगोष्ठी के दूसरे सत्र ‘यात्रावृत्तांत और भारतीयता’ के अध्यक्ष प्रो. दिलीप मेहरा ने भारतीयता के निर्माण में सांकृतिक महत्त्व के स्थलों के महत्त्व पर बल दिया तो मुख्य वक्ता डॉ. नीलम सेन ने श्रोताओं को हिंदी की यात्रा-परंपरा से परिचित कराया और डॉ. भावेशकुमार वाला ने चरेवैति चरैवेति की भारतीय यात्रा-परंपरा को मनुष्यता के विकास का बुनियादी सूत्र के रूप में रेखांकित किया। तीसरे सत्र के अध्यक्ष प्रो. कुबेर कुमावत ने श्रोताओं को समय-दर-समय यात्रा और यात्रा-लेखन में आए बदलावों से अवगत कराया। मुख्य वक्ता प्रियंका पटेल ने श्रोताओं को गुजराती प्रवास-लेखन की प्रमुख प्रवृत्तियों और विशेषताओं को स्पष्ट किया तो डॉ. कन्हैयालाल पटेल ने अपने यात्रानुभवों के माध्यम से जीवन में आए परिवर्तनकारी बदलावों से श्रोताओं को अवगत कराया। संगोष्ठी के दूसरे दिन (23/06/2026) की शुरूआत यात्रा और स्त्री विषयक चौथे सत्र से हुई, जिसकी पहली वक्ता डॉ. नीलम जाँगिड़ ने बताया कि यात्राएं स्त्री में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है और स्वतंत्रचेता ्त्रिरयाँ स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण करती हैं। डॉ. आशा के. गोहिल ने अपने यात्रानुभवों के माध्यम से बताया कि यात्राएं स्त्री के अनुभव जगत का विस्तार करते हुए उसे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनाती हैं। चौथे सत्र के अध्यक्ष प्रो. संजीव कुमार दुबे ने कहा कि प्रारंभिक यात्रावर्णनों में स्त्री की अनुपस्थिति तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति को दर्शाती है, लेकिन नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्थितियाँ बदलीं और स्त्री-पुरुष संबंध में आए बदलानों से रचनात्मक समाज के निर्माण में स्त्री-पुरुष सहभाव को बल मिला, तदंतर यात्रारत ्त्रिरयों के ऐसे यात्रावृत्तांत सामने आए, जिनमें भारतीयता के विविधरंगी रूप देखने को मिले। पाँचवे सत्र में सोनाली शेलार, मोहिनी शर्मा, कोमल माली, संजना गोथम, नितिशा सिंह, श्रिया पटेल, ज्योति प्रसाद और आयूष मांगेला ने अपने-अपने यात्रानुभव साझा किए। सत्र के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन ने यात्रा-लेखन के इस युवा स्वर को संगोष्ठी की उपलब्धि बताते हुए कहा कि यात्राएँ व्यक्ति को तमाम तरह के भेदों से ऊपर उठाते हुए उसे एक बेहतर और जागरूक मनुष्य बनाता है। जब आप एक यात्रावृत्तांत पढ़ते हैं तो आप उस समय के इतिहास, भूगोल, समाज और संस्कृति को भी पढ़ रहे होते हैं। संगोष्ठी के छठे और समापन-सत्र के अध्यक्ष डॉ. भीमसेनाचार जयाचार्य कोप्पर ने कहा कि रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के आधार-ग्रंथ है। रामायण श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के अयन (यात्रा) की और महाभारत पांडवों के यात्राबोध की कथा है और दोनों के मूल में यात्राएं है। एक शासक के रूप में श्रीराम और युधिष्ठिर की कालजयी ख्याति के केंद्र में यात्रानुभवों से अर्जित समाजबोध और राष्ट्रबोध हैं। अपने यात्रानुभवों के जरिए चार्ल्स डार्विन ने जिस विकासवाद के सिद्धांत को जन्म दिया, उसके हजारों साल पहले महर्षि वाल्मीकि अपने यात्रानुभवों के जरिए सुग्रीव जैसे अनूठे मानवविज्ञानी चरित्र का सृजन किया है, जो हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में बसने वाली मानव-प्रजातियों का सटीक वर्णन प्रस्तुत करता है। संगोष्ठी-समाहार में डॉ. प्रतिष्ठा श्रीवास्तव ने विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत यात्रानुभवों और यात्रासंस्मरणों को गोष्ठी की सफलता बताते हुए कहा कि यात्रावृत्तांत सदृश अंतरविद्यावर्ती विधा पर सफल राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कर दमण ने यह सिद्ध किया है कि यदि यहाँ के विद्यार्थियों को हिंदी और गुजराती सदृश भारतीय भाषाओं में एम.ए. में अध्ययन के अवसर मिलें तो ये राष्ट्रीय स्तर पर संघप्रदेश की प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं। उपाचार्य डॉ. बालासुब्रमणियन श्रीधरन ने यात्राओं की स्वरूप में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए बताया कि यात्रा और यात्रालेखन में रुचि रखने वाले विद्यार्थी इसे एक कौशल के रूप में विकसित कर पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर सृजित कर सकते हैं। आमंत्रित अथितियों, विद्वानों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और मीडियाकर्मियों का धन्यवाद-ज्ञापन डॉ. पुखराज जाँगिड़ ने और संगोष्ठी-संचालन डॉ. भावेशकुमार वाला, अमृताबेन टंडेल और कृष्णाली सोलंकी ने किया।

