– वाझा समाज की वर्षों पुरानी परंपरा में उमड़ा जनसैलाब, दीपक कांति बामणिया ने लूटा पवत्रि काजणा (नारियल)
असली आजादी न्यूज नेटवर्क, दीव, 31 अगस्त। दीव में मनाया जाने वाला काजणा पर्व आस्था, लोकपरंपरा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है। संत कबीर भगत की पवत्रि स्मृति में काजणा पर्व की अखंड परंपरा चली आ रही है। वाझा समाज द्वारा की यह परंपरा के तहत इस वर्ष भी श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में उत्साह देखने को मिला। मुख्य रूप से उत्सव के दौरान बड़े आकार के नारियल को बांस, नागरवेल, रस्सी और प्राकृतिक सामग्री से आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। इसके बाद इस पवत्रि काजणा (नारियल) को लूटने की परंपरा निभाई जाती है।
काजणा पर्व के दौरान दीव की गलियां श्रद्धालुओं और दर्शकों से भर उठती हैं। घरों की छतों और आसपास के स्थानों पर भी बड़ी संख्या में लोग इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए एकत्रित होते हैं। यह दृश्य केवल भीड़ का नहीं, बल्कि लोगों की वर्षों पुरानी आस्था और परंपरा के प्रति गहरे जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है।
काजणा पर्व का संबंध स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। इस पर्व के साथ संत कबीर भगत की पवत्रि स्मृति, पूर्वजों की परंपरा और कई पीढ़ियों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। जब काजणा सजाकर यात्रा के रूप में आगे बढ़ाया जाता है, तब ऐसा लगता है मानो पूरा गांव और आसपास का क्षेत्र अपनी पुरानी परंपरा का स्वागत करने के लिए एकजुट हो गया हो। बुजुर्गों की श्रद्धा, युवाओं का उत्साह और बच्चों की जज्ञिासा इस आयोजन को और भी जीवंत बना देती है।
काजणा पर्व की खास पहचान इसका विशाल आकार का सजा हुआ नारियल है। इसे बांस, नागरवेल, रस्सी, फूलों और हरे पत्तों जैसी प्राकृतिक सामग्री से सजाया जाता है। इसकी सजावट में स्थानीय लोककला और धार्मिक भावना का सुंदर मेल देखने को मिलता है। काजणा की तैयारी से लेकर उसकी शोभायात्रा और अंत में उसे लूटने की परंपरा तक हर चरण में लोगों का उत्साह देखने लायक होता है। श्रद्धालुओं के लिए काजणा लूटना केवल एक प्रतियोगिता या मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ी पवत्रि परंपरा मानी जाती है। काजणा लूटने का क्षण आयोजन का सबसे रोमांचक और आकर्षक हस्सिा माना जाता है। जैसे ही काजणा लूटने का अवसर आता है, लोगों में उत्साह चरम पर पहुंच जाता है और बड़ी संख्या में उपस्थित लोग इस क्षण के साक्षी बनते हैं।
इस वर्ष काजणा उत्सव के दौरान दीव गौरक्षक समिति के सदस्य दीपक कांति बामणिया ने पवत्रि काजणा लूटने में सफलता प्राप्त की। उनके द्वारा काजणा लूटे जाने के बाद दीव गौरक्षक समिति के सदस्यों ने एकत्रित होकर दीपक कांति बामणिया को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। दीपक कांति बामणिया की इस उपलब्धि को काजणा पर्व से जुड़ी आस्था और परंपरा के प्रति सम्मान के रूप में देखा गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने उनके उज्ज्वल भवष्यि की कामना करते हुए काजणा पर्व की इस अनूठी और वर्षों पुरानी परंपरा के निरंतर कायम रहने की शुभकामनाएं व्यक्त कीं। गौरतलब है कि काजणा पर्व में समाज के अलग-अलग वर्गों और विभन्नि आयु समूहों के लोग एक साथ शामिल होते हैं। कोई श्रद्धा के साथ आयोजन में भाग लेता है, कोई परिवार के साथ इस परंपरा को देखने पहुंचता है, तो कई लोग अपनी नई पीढ़ी को इस सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने के उद्देश्य से आयोजन का हस्सिा बनते हैं। आज के आधुनिक दौर में जब जीवनशैली तेजी से बदल रही है और नई पीढ़ी तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है, ऐसे लोकपर्व लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। काजणा पर्व इस बात का उदाहरण है कि आधुनिकता के साथ-साथ सदियों पुरानी लोकपरंपराएं भी समाज के बीच जीवंत रह सकती हैं।
समय के साथ समाज में कई बदलाव आए हैं, लेकिन लोकपरंपराओं का महत्व आज भी कायम है। ऐसी परंपराएं केवल अतीत की स्मृति नहीं होतीं, बल्कि समाज की पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता का हस्सिा होती हैं।
काजणा पर्व से जुड़ी परंपराओं को संरक्षित करना और इनके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की सामूहिक जम्मिेदारी है। यदि युवा पीढ़ी इन परंपराओं को समझेगी और उनसे जुड़ेगी, तभी यह सांस्कृतिक विरासत आने वाले वर्षों में भी इसी उत्साह और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ सकेगी। काजणा पर्व का एक दिन समाप्त हो जाता है, लेकिन इसके साथ जुड़ी भावनाएं पूरे वर्ष लोगों के मन में बनी रहती हैं। काजणा के साथ लोगों की आस्था, परंपरा, सामाजिक एकता और पीढ़ियों की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।

