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केन्द्र सरकार ने की कम बारिश से प्रभावित होने वाले देश के 315 जिलों की पहचान

– अति संवेदनशील 111 जिलों में से ज्यादातर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के

नई दिल्ली,(ईएमएस)। दक्षिण पश्चिम मॉनसून का करीब एक महीना बीत चुका है। बारिश की कमी 43 फीसदी को छू गई है। केंद्र सरकार ने बुधवार को देश भर के 315 जिलों की पहचान की है, जो इस साल कम मॉनसून से प्रभावित हो सकते हैं। इनमें से 111 जिलों को अति संवेदनशील माना गया है, जहां सिंचाई का कवरेज 25 फीसदी से कम है। शेष जिलों में से 76 को मध्यम संवेदनशील और 128 को कम संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है। अति संवेदनशील 111 जिलों में से ज्यादातर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के हैं। इनमें से करीब 22 महाराष्ट्र के हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सबसे गंभीर रूप से प्रभावित जिलों को वर्गीकृत करने का फैसला ऐसे समय में आया है जब 1 से 23 जून तक बारिश की कमी 43 फीसदी को छू गई है। हालांकि मंगलवार से बारिश में सुधार के संकेत दिखे। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य के कृषि मंत्रियों, अति संवेदनशील जिलों के जिलाधिकारियों और मौसम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्च-स्तरीय बैठक के बाद कहा कि मौसम विभाग के मुताबिक 2 जुलाई तक कमजोर मॉनसून की स्थिति बने रहने की संभावना है, जो खरीफ की फसल, विशेष रूप से धान और मक्का जैसी ज्यादा पानी की जरुरत वाली फसलों को प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने कहा कि पहचाने गए 111 अति संवेदनशील जिलों में विशेष अभियान चलाकर सुनिश्चित किया जाएगा कि फसल बीमा कवरेज, आसान ऋण उपलब्धता, पुन: रोपण के लिए पर्याप्त बीज, उपलब्ध जल संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल और उर्वरक की उपलब्धता हो सके। खरीफ की फसलों की 22 जून तक बोआई कुल रकबे के 10 फीसदी से कम रही। इस दौरान बोआई का रकबा पिछले साल के 117.9 लाख हेक्टेयर की तुलना में इस साल मामूली बढ़कर 119.9 लाख हेक्टेयर रहा है। सोयाबीन को छोड़कर ज्यादातर फसलों का रकबा ज्यादा है।
मंत्रालय ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में 315 जिलों को चिह्नित किया है, जहां सामान्य से कम बारिश हो सकती है। मंत्रालय ने राज्य-वार आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं। किसानों को कम बारिश की स्थिति के अनुकूल वैकल्पिक फसलों की बोआई की सलाह दी गई है। राज्यों को कम पानी की जरुरत वाले दलहन, तिलहन और मोटे अनाज को बढ़ावा देने और एक ही फसल पर निर्भरता के बजाय छोटी अवधि और जलवायु के प्रति लचीले बीजों की किस्म को प्रोत्साहित करने के निर्देश दिए हैं।

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