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Gen-Z हमारी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार और देशभक्त: मोहन भागवत

– Gen-Z से सरकार पहले ही बात कर लेती तो आंदोलन नहीं बढ़ता: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

मुंबई 06 अगस्त। मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस के 15वें वार्षिक सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश के वर्तमान परिदृश्य, युवा वर्ग और शिक्षा प्रणाली पर एक अत्यंत विचारोत्तेजक भाषण दिया। अपने संबोधन के दौरान संघ प्रमुख ने नई पीढ़ी—जेन-जी और जेन-अल्फा—की कार्यशैली, देशभक्ति और उनके विचारों का पुरजोर समर्थन किया। मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज के युवा अपनी समस्याओं को लेकर यदि आवाज़ उठाते हैं या प्रदर्शन करते हैं, तो उन्हें ‘देश-विरोधी’ ठहराना पूरी तरह से गलत है। वे हमारे ही अपने बच्चे हैं और देश की आने वाली पीढ़ी हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि सिस्टम में कहीं कमी है, तो युवाओं का विरोध जताना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया का एक हिस्सा है। संघ प्रमुख ने अपनी पीढ़ी और आज की युवा पीढ़ी की सोच व दृष्टिकोण के अंतर को गहराई से रेखांकित किया। उन्होंने अतीत का स्मरण करते हुए कहा: जब हम Gen-Z की उम्र के थे, तब हमारी पीढ़ी का स्वभाव ऐसा था कि बड़े जो भी कहते थे, हम उसे चुपचाप मान लेते थे। हमने कभी सवाल नहीं किया। लेकिन आज की Gen-Z और ॠील्ल अ’स्रँं केवल आदेशों का पालन नहीं करती; वे सवाल पूछती हैं, उन्हें तार्किक जवाब चाहिए और साथ ही अपनापन व स्नेह चाहिए।” मोहन भागवत ने भारतीय परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि सवाल पूछना या तर्क करना भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा ‘शास्त्रार्थ’ जैसा ही है। लोकतंत्र में विचारों का आदान-प्रदान और मतभिन्नता ही किसी निष्कर्ष तक पहुँचने में मदद करती है। जब युवा सवाल करते हैं, तो वे समाज और व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं, ताकि उसमें सकारात्मक सुधार किया जा सके। ”Gen-Z अधिक ईमानदार और देशभक्त है” अक्सर आधुनिक पीढ़ी पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अपनी जड़ों, परंपराओं और राष्ट्रीयता से दूर होती जा रही है। हालांकि, मोहन भागवत ने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जब भी उनसे नई पीढ़ी के बारे में पूछा जाता है, तो वे निडर होकर अपनी बात रखते हैं। उनके व्यक्तिगत अनुभव में, Gen-Z और ॠील्ल अ’स्रँं पुरानी पीढि़यों की तुलना में अधिक पारदर्शी, ईमानदार और देश के प्रति समर्पित हैं। यदि उनके सामने सच्चाई और ईमानदारी से देशभक्ति का आह्वान किया जाए, तो वे उसे तुरंत स्वीकार करते हैं और उस पर अमल करते हैं। भागवत ने यह भी कहा कि अगर परिस्थितियों के कारण कभी ऐसा मौका आए जहाँ उन्हें बिना किसी शर्त के भरोसा करना पड़े, तो वे आज की नई पीढ़ी यानी Gen-Z पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं। छात्र आंदोलनों पर संघ प्रमुख का दृष्टिकोण: ”वे एंटी-नेशनल नहीं हैं” हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में प्रतियोगी परीक्षाओं व शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए छात्र आंदोलनों का जिक्र करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इन आंदोलनों के पीछे युवाओं की शिकायतें वास्तविक और जायज हैं।संघ प्रमुख ने प्रमुख बिंदुओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया: संवाद की कमी: आंदोलन या विरोध प्रदर्शन तब शुरू होते हैं जब आधिकारिक स्तर पर संवाद की प्रक्रिया विफल हो जाती है या उसमें देरी होती है। यदि समय रहते युवाओं की समस्याओं को सुना जाता, तो सड़कों पर उतरने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। युवा वर्ग किसी व्यक्ति विशेष या सरकार के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रहा होता, बल्कि वह शिक्षा व प्रशासनिक व्यवस्था की गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए आवाज़ उठाता है। कड़े पुलिस बल या लाठीचार्ज की घटनाओं पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी स्थितियों के पीछे के कारणों का निष्पक्ष अध्ययन होना चाहिए। युवाओं की आवाज़ को दबाने के बजाय उनके साथ संवेदनशील संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग मोहन भागवत ने भारतीय शिक्षा क्षेत्र में गहराई से पांव पसार चुके व्यापारीकरण पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई व्यवसाय या मुनाफा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार और सामाजिक विकास का मुख्य स्तंभ है। शिक्षा क्षेत्र के लिए मोहन भागवत के मुख्य सुझाव:जीडीपी का 6% आवंटन: संघ प्रमुख ने सरकार से अपील की कि भारत के कुल बजट का कम से कम 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च किया जाना चाहिए। सभी स्तरों पर शिक्षा सर्वसुलभ और किफायती होनी चाहिए। फीस के ढांचे को नियंत्रित करने की सख्त जरूरत है। केवल पाठ्यक्रम बदलने से काम नहीं चलेगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान देना होगा। सरकारी प्रयासों के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी शिक्षण संस्थानों के विकास और गुणवत्ता सुधार में अनिवार्य होनी चाहिए। सोशल मीडिया और सामाजिक समरसता पर विचार अपने व्यापक संबोधन में संघ प्रमुख ने आज के दौर में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना किसी समस्या का समाधान नहीं है; इसके बजाय समाज में आत्म-अनुशासन और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही, समाज के समावेशी स्वरूप की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति ने हमेशा हर तरह के विविधतापूर्ण वर्गों को अपने भीतर समाहित किया है। समाज के हर नागरिक को सम्मान और समानता के साथ जीने का पूरा अधिकार है।
युवाओं के साथ विश्वास और आत्मीयता का रिश्तामोहन भागवत के इस बयान ने देश भर में युवा वर्ग, नीति-निर्माताओं और सामाजिक विचारकों का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि नई पीढ़ी को केवल उपदेश देने के बजाय उनकी समस्याओं को आत्मीयता और समझदारी के साथ सुनना होगा। Gen-Z केवल सवाल पूछने वाली पीढ़ी नहीं है, बल्कि वह भारत को एक मजबूत, पारदर्शी और आधुनिक दिशा में ले जाने वाली ऊर्जावान शक्ति है। युवाओं के प्रति संघ प्रमुख का यह सहानुभूतिपूर्ण और विश्वासात्मक दृष्टिकोण निस्संदेह पीढ़ीगत अंतर को पाटने और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहन देने का काम करेगा।

 

 

 

 

 

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